उदबोधन के कुछ अंश ........३०.०६ .२०१२ ..........प्रिय साथियों ,........जब इस संस्था में प्रवेश किया था ,तब मैं मात्र ऊर्जा से भरा युवक था ,आज जब इस संस्था की सक्रिय कार्य प्रणाली से मुक्त हो रहा हूँ ,तब अनुभव एवम योग्यता जुड़ने के साथ और अधिक ऊर्जावान होकर, पारिवारिक एवम सामाजिक दाइत्वों की पूर्ती हेतु, सक्रिय होने जा रहा हूँ.....ये क्षण है, ईश्वर एवम उन योग्य जनों का, आभार प्रकट करने का जिनके बिना ये सब संभव नंही हो पाता...सर्वप्रथम ईश्वर के अनुग्रह हेतु, जो मुझ पर हमेशा रहा ,पूर्वजों एवम माता पिता को जिनकी दुआओं के बिना अवतरण संभव नहीं हो पाता,गुरुजनों का जिन्होंने समाज में व्यवहार करने योग्य बनाया ,उन योग्य साथियों का जो इस राह में मेरे सहयोगी बने ,जिन्होंने सहयोग करके, मुझे संगठन की ताकत से रूबरू कराया ,आलोचना करके, मुझे सुधरने का अवसर दिया और मार्ग में बाधाएं पैदा करके, संघर्ष करते हुए कैसे लक्ष्य की ओर बढ़ा जाता है ,ये जानने का अवसर दिया ,उन सभी साथियों को बहुत बहुत प्यार ,अपने दोनों योग्य बच्चों का धन्यवाद,जिन्होंने विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त कर हमें गौरवान्वित होने का अवसर प्रदान किया ,अंत में अपनी जीवनसंगिनी का, जिनके प्रयासों के बिना, ये संभव नहीं हो पाता या ये कहना उचित होगा की मेरे जीवन में जो भी आनंददायक एवम रचनात्मक है ,सब उन्ही की देन है ..........मेरा ऐसा मानना है की यदि पिता या पति समर्थ एवम योग्य होता है ,तो समाज में रसूख बढ़ता है,पर यदि माता या पत्नी समर्थ एवम योग्य हो तो रसूख तो बढ़ता ही है ,परिवार की ,बच्चों की आतंरिक सामर्थ्य एवम ताकत में कई गुना बढ़ोतरी हो जाती है ............मुझसे पूछा गया की आज कैसा महसूस हो रहा है ,तो मेरा कहना है की लियोनार्दो की पेंटिंग, मोनालिज़ा की तरह ,जिसकी एक आँख में मुस्कुराहट है तो दूसरी में आंसू ....लेकिन भारतीय पद्यति में तो वानप्रस्थ ५० के बाद शुरू हो जाता है ,ऐसे तो १० साल पहले ही हम ,युवा पीढ़ी के ले चुके हैं ,६० पुरे होने पर ,सो ये समय है ,नई पीढ़ी के स्वागत का ,जो नई जरूरतों के हिसाब से योग्य है ,अतः जब अपना भविष्य योग्य एवम युवा हाथों में जाते देखता हूँ ,तो अच्छा लग रहा है ,यही आशा है की, संस्था को ये युवा और ऊँचे शिखरों तक ले जायेंगे ,........इस संस्था में अपनी उम्र का बड़ा और सदाबहार हिस्सा आन्नदमय जिया है ,तो भूलेगा तो नहीं ,पर आज से इस संस्था की मेरी यात्रा म्य्थ(कहानी) होने की दिशा में अग्रसर हो चुकी ,और यही जीवन यात्रा है ,जैसे बचपन ,स्कूल के दिन ,किशोरवय ,युवावस्था सब कहानी हो गई ,जो मेरी स्मृति में है ,पर धरातल पर अब किसी को नहीं दिखती .....चलते चलो ,चलता हुआ ,साहिल है zinagi, manzil
से आगे, manzil है जिंदगी .......बस इतना करम ,मेहरबानी बनाए रखना ,की मेरे लिए अपने दिल में मोहब्बत सजाये रखना ....मोहब्बत khushboo है ,हमेशा साथ रहती है ,तन्हाई में भी कोई तनहा नहीं होता .........इस आयोजन को इतना भव्य बनाने हेतु आप सभी का आभार ,धन्यवाद .
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